krishan-Radha

14 Jul

कृष्ण-भक्ति कवितायेँ | विद्यापति

भोरहि सहचरि कातर दिठि हेरि छल छल लोचन पानि।
अनुखन राधा राधा रटइत आधा आधा बानि
राधा सयँ जब पनितहि माधव माधव सयँ जब राधा
दारुन प्रेम तबहि नहिं टूटत बाढ़त बिरह क बाधा
दुहुँ दिसि दारु दहन जइसे दगधाइ आकुल कीट परान।
ऐसन बल्लभ हेरि सुधामुखि कवि विद्यापति भान |
इस पद का भावार्थ यह है कि प्रतिक्षण कृष्ण का स्मरण करते करते राधा कृष्ण रूप हो जाती हैं और अपने को कृष्ण समझकर राधा के वियोग में ‘राधा राधा’ रटने लगती हैं। फिर जब होश में आती हैं तब कृष्ण के विरह में संतप्त होकर फिर ‘कृष्ण कृष्ण’ करने लगती हैं। इस प्रकार अपनी सुध में रहती हैं तब भी, नहीं रहती हैं तब भी दोनों अवस्थाओं में उन्हें विरह का ताप सहना पड़ता है। उनकी दशा उस लकड़ी के भीतर के कीड़े सी रहती है जिसके दोनों छोरों पर आग लगी हो।

—- साभार : हिंदीकुञ्ज

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Undoubtedly, this is one of sweetest depiction of love ever….

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