Ghazal 2

15 Aug

बरसों बीते हैं, ये इक और भी बीत ही जायेगा |
हर रोज़ तो मरते ही हो, इक रोज़ तो जीकर देखो|

मैं “कौन” नहीं, मैं एक “क्या” हूँ| जानना चाहते हो?
परदे में छुपी दरारों को, कभी मेरे घर आकर देखो|

घर दूर बहुत है उनका, उनके दिल में जाकर देखो|
उन दरियाई आँखों में, इक रोज़ ज़रा नहाकर देखो|

जानते हो इंतज़ार उन पथराई आँखों का?
इक मुस्कान न सही, एक आंसू ही लाकर देखो|

चाँद में दाग बहुत हैं, ये तो “शिव” तुम जानते हो|
पर इक रोज़ ज़रा सूरज कि तपिश छुपाकर देखो|

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One Response to “Ghazal 2”

  1. Shiv February 26, 2012 at 2:06 AM #

    Reblogged this on Shiv’s Weblog.

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