Ghalib and Daag : A convolution

25 Mar

Two great poets- Ghalib and Daag, two different eras, two different moods- alternating shers to create something unique- A total Beauty! By Tina Sani

ये न थी हमारी किस्मत, कि विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते, यही इंतज़ार होता    –Ghalib
—–
अज़ब अपना हाल होता, जो विसाल-ए-यार होता,
कभी जान सदके होती, कभी दिल निसार होता.. —Daag
===
कोई मेरे दिल से पूछे, तेरे तीर-ए-नीमकश को,
ये खलिश कहाँ से होती, जो जिगर के पार होता.. –Ghalib
—–
ये मज़ा था दिल्लगी का, कि बराबर आग लगती,
न तुझे करार होता, न मुझे करार होता.. —Daag
===
हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्यूँ न गर्क-ए-दरिया,
न कभी ज़नाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता…

कोई फ़ितना था क़यामत, ना फिर आशकार होता
तेरे दिल पे काश ज़ालिम, मुझे इख़्तियार होता..
===
ये कहाँ की दोस्ती है, कि बने हैं दोस्त नासेह,
कोई चारासाज़ होता, कोई ग़म-गुसार होता,

न मज़ा है दुश्मनी में, न है लुत्फ़ दोस्ती में,
कोई गैर-गैर होता, कोई यार-यार होता..
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तेरे वादे पर जिए हम, तो ये जान झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते, अगर ऐतबार होता
—-
तेरे वादे पर सितमगर, अभी और सब्र करते,
अगर अपनी ज़िन्दगी का, हमें ऐतबार होता…
===
कहूँ किससे मैं की क्या है, शब्-ए-ग़म बुरी बला है,
मुझे क्या बुरा था मरना, अगर एक बार होता..

अगर और जीते रहते, यही इंतज़ार होता
—–
अज़ब अपना हाल होता, जो विसाल-ए-यार होता,
कभी जान सदके होती, कभी दिल निसार होता..

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