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लिखता जाऊँ

11 Feb

जी करता है कि लिखता जाऊँ,
लिखता जाऊं, कहता जाऊं;
वो सारी बातें जो तुमने कही,
या कहते कहते ठिठक गयी|

विषयों की भी कमी नहीं है,
ग्रन्थ लिख सकता हूँ-

उस अंतरिक्ष में जाते यान पर,
सड़क किनारे कुचले श्वान पर,
आज फिर से टूटे एक अरमान पर;
थमती ठिठकती हर घ्राण पर।

 

शब्द भी हैं अगणित-

कुछ शब्दकोष में बंधे हुए
कुछ स्वछन्द हवा में उड़ते
कुछ इतराते, कुछ चहकते,
कुछ सहमे, कुछ सिसकते।

 
पर इस सूखे निर्झर से जीवन में भाव कहाँ से लाऊँ ?
जी तो करता है की आज फिर से मैं लिखता जाऊं!

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Despair and Hope

9 Mar

DESPAIR
तुम कोई तो नहीं थे,
फिर क्यूँ हर वक़्त  याद आते हो?

कहाँ कुछ कहा था हमने,
फिर क्या मुझे इस तरह तड़पा जाता है?

तुम न आये थे, न आओगे
फिर क्यूँ हर आहट  मुझे चौंका जाती है?

भूल चुकी होगी तुम यक़ीनन
फिर मैं भला किस गुल-ए-गुलज़ार में हूँ ?
HOPE
तुम कहीं नहीं हो
फिर भी  मैं तुम्हारे इंतज़ार में हूँ

तुम कोई नहीं हो
फिर भी मैं तुम्हारे प्यार में हूँ

पतझर आधा बीत चूका है,
फिर भी आज तलक मैं बहार में हूँ

कभी फुर्सत में चले आना
एक अरसे से मैं अपने ही मज़ार पे हूँ

ek aur janmdin

12 Sep

एक और जन्मदिन आया है,
एक और वर्ष बीत गया!

कितने सिकुड़ गए हैं अब बरस?
क्या है याद मुझे पिछले बरस से!

कुछ चेहरे जो झिड़क-तुनक कर चले गए,
कुछ आंसू जो टपक-टपक कर गिर गए,
कुछ साथी जो हाथ झटक कर चले गए,
कुछ पत्थर जो मुझपे सर पटक कर चले गए,

कुछ तमन्नाएं जो रहम-सहम के रह गयी,
कुछ कल्पनाएँ जो उमड़-घुमड़ के रह गयी,
कुछ बातें जो जो होठों पे थम के रह गयी,
कुछ यादें जो फ़ैल-सिमट कर बन गयीं;

क्या है याद मुझको पिछले बरस से?

ज़िन्दगी तुम्हारे बिना बस सालों का इक संग्रह है…

30000 feet above

8 Jun

ऊपर नीला, स्वच्छ आकाश,

जैसे किसी चित्रकार ने अभी-अभी अपनी कैनवास पोती हो!
जैसे माँ के आँचल ने मुझे पूरा ढक लिया हो..
साफ़, स्वच्छ, जैसे किसी बालक का मन हो.

नीचे चमकीले, सुनहरे बदल,

सूरज की किरणों को परावर्तित करती,
अधूरे circles के टुकडें
जैसे किसी बालक ने bore होकर पुरे नहीं किये|
एक-एक टुकड़ा एक किस्सा है, एक कल्पना है
उस चित्रकार की..

और बीच में यह धातु का टुकड़ा,
मानव का चंचल प्रयास,
भर रहा हो जैसे अपनी मुट्ठी में आकाश!
उस धरती से हजारों गज ऊपर,
जहाँ छल है, द्वेष है,
सीमाएं हैं..

.

ऐ ज़िन्दगी चुपके से आज हमने भी थोड़ी जी ली है

2 Mar

उनकी इक नज़र ने कह डाली हमसे दास्ताँ,
पर ज़माने के लिए वो बहुत शर्मीली हैं..

ऐ ज़िन्दगी चुपके से आज हमने भी थोड़ी जी ली है…

अब होश में हम आएंगे न यारों,
उन आँखों से इक घूंट जो पी ली है..

ऐ ज़िन्दगी चुपके से आज हमने भी थोड़ी जी ली है…

सुनते आये हैं ज़माने से कि ये रोग बुरा होता है,
और आज हमने ही अक्ल से दुश्मनी कर ली है..

ऐ ज़िन्दगी चुपके से आज हमने भी थोड़ी जी ली है…

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