Tag Archives: newbie’s poem

लिखता जाऊँ

11 Feb

जी करता है कि लिखता जाऊँ,
लिखता जाऊं, कहता जाऊं;
वो सारी बातें जो तुमने कही,
या कहते कहते ठिठक गयी|

विषयों की भी कमी नहीं है,
ग्रन्थ लिख सकता हूँ-

उस अंतरिक्ष में जाते यान पर,
सड़क किनारे कुचले श्वान पर,
आज फिर से टूटे एक अरमान पर;
थमती ठिठकती हर घ्राण पर।

 

शब्द भी हैं अगणित-

कुछ शब्दकोष में बंधे हुए
कुछ स्वछन्द हवा में उड़ते
कुछ इतराते, कुछ चहकते,
कुछ सहमे, कुछ सिसकते।

 
पर इस सूखे निर्झर से जीवन में भाव कहाँ से लाऊँ ?
जी तो करता है की आज फिर से मैं लिखता जाऊं!

Quote

titled

20 Jun

जो तेरे दिल में मेरी जगह नहीं है,
रुकने की कोई तो वज़ह नहीं है।

जिसमे तेरी यादों का साया ना हो,
ऐसी तो कोई गुज़र नहीं है।

चाहता तो हूँ पर क्या दुआ दूँ,
मेरी दुआओं में कोई तो असर नहीं है।

ताउम्र मोहब्बत अब कर न पाउँगा,
अब वो दिल नहीं है, जिगर नहीं है।

अब जीने में ही क्या रखा है,
जो मेरी ज़िन्दगी में “वह” नहीं है।

ek aur janmdin

12 Sep

एक और जन्मदिन आया है,
एक और वर्ष बीत गया!

कितने सिकुड़ गए हैं अब बरस?
क्या है याद मुझे पिछले बरस से!

कुछ चेहरे जो झिड़क-तुनक कर चले गए,
कुछ आंसू जो टपक-टपक कर गिर गए,
कुछ साथी जो हाथ झटक कर चले गए,
कुछ पत्थर जो मुझपे सर पटक कर चले गए,

कुछ तमन्नाएं जो रहम-सहम के रह गयी,
कुछ कल्पनाएँ जो उमड़-घुमड़ के रह गयी,
कुछ बातें जो जो होठों पे थम के रह गयी,
कुछ यादें जो फ़ैल-सिमट कर बन गयीं;

क्या है याद मुझको पिछले बरस से?

ज़िन्दगी तुम्हारे बिना बस सालों का इक संग्रह है…

काश ये दुनिया छोड़ देता

23 Jul

Wonderful poem by a great friend… http://sthedeadone.blogspot.in/

हर दिन कोशिश यही करता
चूका देता उधार यहाँ के
न इसका कोई क़र्ज़ मुझपे होता
शुन्य सा जीवन करके
काश ये दुनिया छोड़ देता

इसी तमन्ना में ढूढता फिरता इधर- उधर
हर तरीका आजमाता ,उधर कर्ज़ बढ़ता ही जाता
शुन्य सा जीवन करने चला,समंदर सा होता जाता
लहर के हिलोरें मुझे इसी दुनिया में पटक देती

हर दिन कोशिश यही करता
काश ये दुनिया छोड़ देता …

30000 feet above

8 Jun

ऊपर नीला, स्वच्छ आकाश,

जैसे किसी चित्रकार ने अभी-अभी अपनी कैनवास पोती हो!
जैसे माँ के आँचल ने मुझे पूरा ढक लिया हो..
साफ़, स्वच्छ, जैसे किसी बालक का मन हो.

नीचे चमकीले, सुनहरे बदल,

सूरज की किरणों को परावर्तित करती,
अधूरे circles के टुकडें
जैसे किसी बालक ने bore होकर पुरे नहीं किये|
एक-एक टुकड़ा एक किस्सा है, एक कल्पना है
उस चित्रकार की..

और बीच में यह धातु का टुकड़ा,
मानव का चंचल प्रयास,
भर रहा हो जैसे अपनी मुट्ठी में आकाश!
उस धरती से हजारों गज ऊपर,
जहाँ छल है, द्वेष है,
सीमाएं हैं..

.

Ghazal 2

15 Aug

बरसों बीते हैं, ये इक और भी बीत ही जायेगा |
हर रोज़ तो मरते ही हो, इक रोज़ तो जीकर देखो|

मैं “कौन” नहीं, मैं एक “क्या” हूँ| जानना चाहते हो?
परदे में छुपी दरारों को, कभी मेरे घर आकर देखो|

घर दूर बहुत है उनका, उनके दिल में जाकर देखो|
उन दरियाई आँखों में, इक रोज़ ज़रा नहाकर देखो|

जानते हो इंतज़ार उन पथराई आँखों का?
इक मुस्कान न सही, एक आंसू ही लाकर देखो|

चाँद में दाग बहुत हैं, ये तो “शिव” तुम जानते हो|
पर इक रोज़ ज़रा सूरज कि तपिश छुपाकर देखो|

at the crossroads of life

29 Jan

Q. (Problem)
Life seems to have this caption,
you’ll always be given ‘n’ option,
N’ all of ’em will equally seem green.
What then, this all does mean?

A. (perhaps)
This all may seem critical to your eyes,
but from the high skies,
or after the time flies-
you’ll see things calmer and better,
N’ see, all this does/did hardly matter.

C. (certainty)
Life is nothing but just a game,
n’ must be played with the spirit of same.
Do not complicate the things and go wrong,
just smile, sing the song, and get along.

%d bloggers like this: