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लिखता जाऊँ

11 Feb

जी करता है कि लिखता जाऊँ,
लिखता जाऊं, कहता जाऊं;
वो सारी बातें जो तुमने कही,
या कहते कहते ठिठक गयी|

विषयों की भी कमी नहीं है,
ग्रन्थ लिख सकता हूँ-

उस अंतरिक्ष में जाते यान पर,
सड़क किनारे कुचले श्वान पर,
आज फिर से टूटे एक अरमान पर;
थमती ठिठकती हर घ्राण पर।

 

शब्द भी हैं अगणित-

कुछ शब्दकोष में बंधे हुए
कुछ स्वछन्द हवा में उड़ते
कुछ इतराते, कुछ चहकते,
कुछ सहमे, कुछ सिसकते।

 
पर इस सूखे निर्झर से जीवन में भाव कहाँ से लाऊँ ?
जी तो करता है की आज फिर से मैं लिखता जाऊं!

The More Loving One

11 Apr

Looking up at the stars, I know quite well
That, for all they care, I can go to hell,
But on earth indifference is the least
We have to dread from man or beast.

How should we like it were stars to burn
With a passion for us we could not return?
If equal affection cannot be,
Let the more loving one be me.

Admirer as I think I am
Of stars that do not give a damn,
I cannot, now I see them, say
I missed one terribly all day.

Were all stars to disappear or die,
I should learn to look at an empty sky
And feel its total dark sublime,
Though this might take me a little time.

-W. H. Auden, 1907 - 1973
Quote

titled

20 Jun

जो तेरे दिल में मेरी जगह नहीं है,
रुकने की कोई तो वज़ह नहीं है।

जिसमे तेरी यादों का साया ना हो,
ऐसी तो कोई गुज़र नहीं है।

चाहता तो हूँ पर क्या दुआ दूँ,
मेरी दुआओं में कोई तो असर नहीं है।

ताउम्र मोहब्बत अब कर न पाउँगा,
अब वो दिल नहीं है, जिगर नहीं है।

अब जीने में ही क्या रखा है,
जो मेरी ज़िन्दगी में “वह” नहीं है।

Despair and Hope

9 Mar

DESPAIR
तुम कोई तो नहीं थे,
फिर क्यूँ हर वक़्त  याद आते हो?

कहाँ कुछ कहा था हमने,
फिर क्या मुझे इस तरह तड़पा जाता है?

तुम न आये थे, न आओगे
फिर क्यूँ हर आहट  मुझे चौंका जाती है?

भूल चुकी होगी तुम यक़ीनन
फिर मैं भला किस गुल-ए-गुलज़ार में हूँ ?
HOPE
तुम कहीं नहीं हो
फिर भी  मैं तुम्हारे इंतज़ार में हूँ

तुम कोई नहीं हो
फिर भी मैं तुम्हारे प्यार में हूँ

पतझर आधा बीत चूका है,
फिर भी आज तलक मैं बहार में हूँ

कभी फुर्सत में चले आना
एक अरसे से मैं अपने ही मज़ार पे हूँ

Where the mind is without fear

26 Jan

Where the mind is without fear and the head is held high
Where knowledge is free
Where the world has not been broken up into fragments
By narrow domestic walls
Where words come out from the depth of truth
Where tireless striving stretches its arms towards perfection
Where the clear stream of reason has not lost its way
Into the dreary desert sand of dead habit
Where the mind is led forward by thee
Into ever-widening thought and action
Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.

RabindraNath Tagore

ek aur janmdin

12 Sep

एक और जन्मदिन आया है,
एक और वर्ष बीत गया!

कितने सिकुड़ गए हैं अब बरस?
क्या है याद मुझे पिछले बरस से!

कुछ चेहरे जो झिड़क-तुनक कर चले गए,
कुछ आंसू जो टपक-टपक कर गिर गए,
कुछ साथी जो हाथ झटक कर चले गए,
कुछ पत्थर जो मुझपे सर पटक कर चले गए,

कुछ तमन्नाएं जो रहम-सहम के रह गयी,
कुछ कल्पनाएँ जो उमड़-घुमड़ के रह गयी,
कुछ बातें जो जो होठों पे थम के रह गयी,
कुछ यादें जो फ़ैल-सिमट कर बन गयीं;

क्या है याद मुझको पिछले बरस से?

ज़िन्दगी तुम्हारे बिना बस सालों का इक संग्रह है…

काश ये दुनिया छोड़ देता

23 Jul

Wonderful poem by a great friend… http://sthedeadone.blogspot.in/

हर दिन कोशिश यही करता
चूका देता उधार यहाँ के
न इसका कोई क़र्ज़ मुझपे होता
शुन्य सा जीवन करके
काश ये दुनिया छोड़ देता

इसी तमन्ना में ढूढता फिरता इधर- उधर
हर तरीका आजमाता ,उधर कर्ज़ बढ़ता ही जाता
शुन्य सा जीवन करने चला,समंदर सा होता जाता
लहर के हिलोरें मुझे इसी दुनिया में पटक देती

हर दिन कोशिश यही करता
काश ये दुनिया छोड़ देता …

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